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मुझे पता था यह होगा। कि देश से बाहर जा कर हिन्दी सुधारने की इच्छा बढ़ जाएगी। हिन्दी सीखना तो स्कूल की आठवी में ही छूट गई थी। और मैं कभी अख्वार तो पढ़ता नहीं था - न हिन्दी न अंग्रेज़ी में। तो भाषा का ज्ञान तो नष्ट होना ही था। मेरी हिन्दी कितनी बर्बाद हो चुकी थी इसका मुझे पिछले साल एहसास हुआ - पहली बार जब मैं अपनी नानी के साथ दैनिक जागरण पढ़ रहा था और वे मुझसे दसगुनी ज़्यादा गति से पढ़ रहीं थीं - हाँ उन्हें भी इस बात पर हंसी आई - और दूसरी बार जब मैंने थोड़ा बहुत हिन्दी में कम्प्यूटर पर लिखना शुरू किया और मुझे हर दूसरे वाक्य के लिए शब्दकोश का सहारा लेना पड़ा (वैसे जब बात आगे आई है तो यह भी कह दिया जाए कि हिन्दी के लिए मुझे अभी तक कोई अच्छा शब्दकोश मिला नहीं है - एक यह है जो सबसे ठीक ठाक लगता है पर यह भी कुछ खास नहीं है)।

ज्ञान को सुधारने की तो एक ही तरक़ीब है - सीखो और इस्तेमाल करो। क्योंकि आजकल दोपहर में मेरी कोई क्लास नहीं लगती है मैं कल से संस्क्रित की क्लास में बैठने जाऊँगा। मुझे स्कूल में कभी संस्क्रित सीखने की कोई खास इच्छा नहीं थी पर अभ मौसम बदल गया है। पहले हम मज़ाक उड़ाते थे उन लोंगों का जो फ़्रांसीसी जर्मन और रूसी छोड़ कर संस्क्रित लेते थे। आखिर संस्क्रित का असली उपयोग ही क्या था? पर अब जब मैंने इस बारे में कुछ ज़्यादा गौर किया है मुझे लगता है कि संस्क्रित हमारे लिए उस तरह महत्वपूर्ण है जिस तरह लैटिन अंग्रेज़ी के लिए है। मुझे यह क्लास लेने की और ज़्यादा इच्छा भी इसलिए हुई क्योंकि जो प्रोफ़ेसर पढ़ा रहें हैं उनका नाम हिंदुस्तानी नहीं लगता और अगर कोई अमरीकी पढ़ा रहा है फिर तो जिज्ञासा और भी ज़्यादा होती है।

चीनी सीखने में बहुत मज़ा आ रहा है। अध्यापिकाजी भी बहुत मज़ेदार हैं। और चीनी लिखना तो... बहुत ही सही है। अब तक हम चीनी में सैंतीस शब्द सीख चुकें हैं। चीनी की ध्वनि हिन्दी से काफ़ी मिलती जुलती है। कभी मिलूंगा तो सुनाऊँगा।

明天見 (Míngtiān Jiàn)!
(चीनी में 'कल मिलेंगे' या 'मिंग् तियेन् जियेन्')

मुझे कहने में शर्मिंदगी होती पर सच तो यह है कि मेरी हिन्दी बिलकुल रद्द है। गलतियाँ निगाह डालिये तो बता दीजियेगा। धन्यवाद।

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