पिछले जितनी भी बार मैं दिल्ली आया हूँ, हमेशा यह एक माल पुआ खाने की तमन्ना रहती थी, जो आखिरकार कल रात पूरी हो गई। हाँ, प्लान के मुताबिक सब कुच्छ एकदम परफ़ेक्ट तो नहीं हुआ क्योंकि हल्दीराम के पास रबड़ी खतम हो गई थी और वहाँ पर दस मिनट प्रतीक्षा करने की बात थी। रबड़ी के लिए इन्तेय्ज़ार या फिर रबड़ी को गोली मारकर घर लौटना? घर लौटना। घर पहुंचकर और एक कठिनाई सामने आई, और वह यह थी कि घर पर नानी ने बनाई हुई थी गाजर की खीर। अब दोनो चीज़ें - खीर और माल पुआ - एक के बाद एक खाईं जाएँ तो बहुत अति लगेगी, इसलिए मैंने यह निर्णय लिया कि माल पुए के साथ रबड़ी की तरह गाजर की खीर खाई जाए, और क्या बताऊँ, बहुत ही स्वादिष्ट कॉम्बिनेशन है यह यार! अगर माल पुआ और मेरी नानी की बनाई हुई गाजर की खीर कहीं मिले तो अवश्य खा के देखियेगा।
चीनियों से कहाँ कहाँ भागेंगे
खैर, यह तो रही माल पुए की बात, इसके अलावा, और क्या गल करनी है? हाँ, मेरा और चीनी लोगों से तो अब कुछ अटूट सा बन्धन बन गया है। वैसे तो मैने दिल्ली में सत्रह सालों में एक भी चीनी इंसान नहीं देखा होगा, मगर अब जब चीनी पढ़नी शुरू कर दी है तो चीनी लोग मेरे घर चाय पीने आने लगे हैं। ऐसा हुआ कि पिताजी का अस्पताल कोई महासम्मेलन (कॉन्फ़रेन्स) आयोजित कर रहा था और उसी चक्कर में उन्होनें शांघाई से दो नामी ग्रामी चीनी डॉक्टरों को आने का न्यौता दिया था। तो मेरे पिताजी एक श्याम आकर मुझसे कहतें हैं कि वे दो चीनियों को गोपाला के रस गुल्ले खिलाने जा रहे है और पूछ्तें हैं कि मुझे उनसे से मिलने की इच्छा है कि नहीं। अवश्य जाएंगे रस गुल्ले खिलाने भाई! फिर गए हम और मिले चीनियों से, बड़ा मज़ा आया क्योंकि उन्होंनें तो किसी सपने में भी नहीं सोचा था कि उनको भारत में कोई चीनी बोलने वाला व्यक्ति मिलेगा। उनसे थोड़ी देर बात करी तो पता चला कि उनकी भी अंग्रेजी कोई टॉप-क्लास नहीं थी और मुझे बड़ा मज़ा आया क्योंकि उन्होंनें न केवल मुझे कुच्छ शब्दों को चीनी से अंग्रेजी में बदलनें का अवसर दिया और अंग्रेजी के कुच्छ सवालात पूछे, और तो और, मुझे दो चीनी किताबें भी भेंट कर दीं। उन्हें यह जानकार भी बड़ी प्रसन्नता हुई कि मैं उनकी भाषा पढ़ लिख भी सकता था और उन्होंनें अपने मनोरंजन के लिए मुझसे कुच्छ शब्द पढ़वाए। बातों ही बातों में यह पता चला कि उनमें से एक का एक बेटा भी है और वे कह रहे थे कि उसकी पांचवी कक्षा की गणित उनकी खुद की गणित के मुक़ाबले में अभी से ही कितनी भयानक हो गई है। (वैसे तो मैंने इस शब्द को "भयानक" लिखा है पर यह असलियत में चीनी का एक ऐसा अनोखा शब्द है जिसकी किसी और भाषा में ठीक तरह से बदलाव नहीं किया जा सकता है। मूल चीनी में इसे "लीहाई" (厉害) बोला जाता है, और इसका अंग्रेजी में सबसे अच्छा करण "फ़ौरमिडेबल" है। यह शब्द दोनों अच्छी और बुरी खूबियों का वर्णन करने के लिए इस्तेमाल होता है।)
जब वी मेट
सबसे पहले तो इस पिक्चर के नाम का हिन्दी-करण थोड़ा सा... हाँ, मुझे लगता है आप स्वयं देख सकतें हैं इसमें क्या खासियत है। नाम के अलावा, मैंने पिक्चर इसलिए देखी क्योंकि बहुत लोगों का कहना था कि अच्छी फ़िल्म है और आमतौर की फ़िल्मों से थोड़ी हट के है। कि यह फ़िल्म अच्छी बनी है, इस दावे पर मैं कोई आपत्ति नहीं जताऊंगा, परन्तु मुझे लोगों की चर्चा सुनकर ऐसा प्रतीत हुआ था कि यह फ़िल्म कुच्छ अलग होगी और फ़िल्म के इस दावे को मैं दुर्भाग्य से अपनी सहमती नहीं दे सकता। हाँ, गाने अच्छे थे, कलाकारी भी अच्छी थी, मगर ऐसी कोई बात नहीं हुई जिसको मैं देखकर यह कह सकूं कि हाँ इस फ़िल्म की कहानी तो सच में सर्व श्रेष्ठ है। हाँ, अगर फ़िल्म देखने के समय मन में ऐसी कोई अपेक्षा न होती तो वह थोड़ी और पसंद आती, मगर फ़िल्म तो मेरे ख्याल से अच्छी बनी है, मनोरंजक है और बहुत देखने लायक है। कुच्छ गाने भी बहुत अच्छे हैं जैसे "आओ मिलो चलो", "तुम से ही" और "ये इश्क़ हाए"।
२००८
वैसे साल २००८ तो आ गया है, तो अब कुछ हफ़्तों के लिए ग़लत तारीख़ जगह जगह लिखनी ही पड़ेगी, और कुछ नव वर्ष के दृढ़ निश्चय बनाने होंगे। मेरी बात सुनिए तो ज़्यादा भारी भरकम प्लान न बनाईयेगा क्योंकि इनकी पूरे होने की संभावना थोड़ी कम ही रहती है। (यह ऐतिहासिक रुप से साबित की हो चुकी सच्चाई है।)
चीनियों से कहाँ कहाँ भागेंगे
खैर, यह तो रही माल पुए की बात, इसके अलावा, और क्या गल करनी है? हाँ, मेरा और चीनी लोगों से तो अब कुछ अटूट सा बन्धन बन गया है। वैसे तो मैने दिल्ली में सत्रह सालों में एक भी चीनी इंसान नहीं देखा होगा, मगर अब जब चीनी पढ़नी शुरू कर दी है तो चीनी लोग मेरे घर चाय पीने आने लगे हैं। ऐसा हुआ कि पिताजी का अस्पताल कोई महासम्मेलन (कॉन्फ़रेन्स) आयोजित कर रहा था और उसी चक्कर में उन्होनें शांघाई से दो नामी ग्रामी चीनी डॉक्टरों को आने का न्यौता दिया था। तो मेरे पिताजी एक श्याम आकर मुझसे कहतें हैं कि वे दो चीनियों को गोपाला के रस गुल्ले खिलाने जा रहे है और पूछ्तें हैं कि मुझे उनसे से मिलने की इच्छा है कि नहीं। अवश्य जाएंगे रस गुल्ले खिलाने भाई! फिर गए हम और मिले चीनियों से, बड़ा मज़ा आया क्योंकि उन्होंनें तो किसी सपने में भी नहीं सोचा था कि उनको भारत में कोई चीनी बोलने वाला व्यक्ति मिलेगा। उनसे थोड़ी देर बात करी तो पता चला कि उनकी भी अंग्रेजी कोई टॉप-क्लास नहीं थी और मुझे बड़ा मज़ा आया क्योंकि उन्होंनें न केवल मुझे कुच्छ शब्दों को चीनी से अंग्रेजी में बदलनें का अवसर दिया और अंग्रेजी के कुच्छ सवालात पूछे, और तो और, मुझे दो चीनी किताबें भी भेंट कर दीं। उन्हें यह जानकार भी बड़ी प्रसन्नता हुई कि मैं उनकी भाषा पढ़ लिख भी सकता था और उन्होंनें अपने मनोरंजन के लिए मुझसे कुच्छ शब्द पढ़वाए। बातों ही बातों में यह पता चला कि उनमें से एक का एक बेटा भी है और वे कह रहे थे कि उसकी पांचवी कक्षा की गणित उनकी खुद की गणित के मुक़ाबले में अभी से ही कितनी भयानक हो गई है। (वैसे तो मैंने इस शब्द को "भयानक" लिखा है पर यह असलियत में चीनी का एक ऐसा अनोखा शब्द है जिसकी किसी और भाषा में ठीक तरह से बदलाव नहीं किया जा सकता है। मूल चीनी में इसे "लीहाई" (厉害) बोला जाता है, और इसका अंग्रेजी में सबसे अच्छा करण "फ़ौरमिडेबल" है। यह शब्द दोनों अच्छी और बुरी खूबियों का वर्णन करने के लिए इस्तेमाल होता है।)
जब वी मेट
सबसे पहले तो इस पिक्चर के नाम का हिन्दी-करण थोड़ा सा... हाँ, मुझे लगता है आप स्वयं देख सकतें हैं इसमें क्या खासियत है। नाम के अलावा, मैंने पिक्चर इसलिए देखी क्योंकि बहुत लोगों का कहना था कि अच्छी फ़िल्म है और आमतौर की फ़िल्मों से थोड़ी हट के है। कि यह फ़िल्म अच्छी बनी है, इस दावे पर मैं कोई आपत्ति नहीं जताऊंगा, परन्तु मुझे लोगों की चर्चा सुनकर ऐसा प्रतीत हुआ था कि यह फ़िल्म कुच्छ अलग होगी और फ़िल्म के इस दावे को मैं दुर्भाग्य से अपनी सहमती नहीं दे सकता। हाँ, गाने अच्छे थे, कलाकारी भी अच्छी थी, मगर ऐसी कोई बात नहीं हुई जिसको मैं देखकर यह कह सकूं कि हाँ इस फ़िल्म की कहानी तो सच में सर्व श्रेष्ठ है। हाँ, अगर फ़िल्म देखने के समय मन में ऐसी कोई अपेक्षा न होती तो वह थोड़ी और पसंद आती, मगर फ़िल्म तो मेरे ख्याल से अच्छी बनी है, मनोरंजक है और बहुत देखने लायक है। कुच्छ गाने भी बहुत अच्छे हैं जैसे "आओ मिलो चलो", "तुम से ही" और "ये इश्क़ हाए"।
२००८
वैसे साल २००८ तो आ गया है, तो अब कुछ हफ़्तों के लिए ग़लत तारीख़ जगह जगह लिखनी ही पड़ेगी, और कुछ नव वर्ष के दृढ़ निश्चय बनाने होंगे। मेरी बात सुनिए तो ज़्यादा भारी भरकम प्लान न बनाईयेगा क्योंकि इनकी पूरे होने की संभावना थोड़ी कम ही रहती है। (यह ऐतिहासिक रुप से साबित की हो चुकी सच्चाई है।)
Labels: Hindi
3 comments
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बढ़े दिनो बाद हिन्दी में लिखे हो। पढ़ के बहुत आनंद मिला। चीनी लोगो से तो तुमने रिशता ही बना लिया है!!!
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भाई यह लेख पढ कर तोह मूँह मेँ पानी आगया । जी तोह चाहता है कि अभी भारत की टिकट करवाऊँ अौर उतरते ही गोलगप्पे, मालपुअा, रसमलाई अादि खाऊँ ।
जहाँ तक रही चलचित्रों की बात है, मैं 'तारे जमिन पर' देखने कि सलाह दूँगा । बडी प्यारी अौर दिल को छू देने वाली चलचित्र है ।
अौर हाँ, नया साल मँगल-मय हो ! -
आदित्यजी, आपने भी बड़ा एक तोप शब्द इस्तेमाल किया है "चलचित्र", पहले कभी सुना तो नहीं है. पहले सोचा कि आपका अपना आविष्कार होगा, इसलिए अच्छा है कि मैंने शब्दकोष से सम्पर्क कर लिया. मैंने भी "तारे ज़मीन पर" की बहुत चर्चा सूनी है मगर यह भी सुना है कि सिनेमा के अन्दर जाओ तो रुमाल लेकर. फ़िल्मों की ही बात कर रहें हैं तो मैंने एक "चक दे इंडिया" फ़िल्म की भी काफ़ी चर्चा सुनी है और आज मैं उसकी DVD खरीद लाया हूँ देखने के लिए.

