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इंडिया में एक बड़ी मुश्किल यह है कि जब विदेशी चीज़ें यहाँ लाकर बेचीं जातीं हैं तो उनके दाम भी वही विदेशी दाम होतें हैं, और इस ही लिए, अगर सौफ़्टवैर का उदाहरण लिया जाये तो मेरे ख्याल से तो पाईरसी का सबसे बड़ा कारण तो यह ही है कि जो माईक्रोसौफ़्ट विन्डोज़ अमरीका में दो सौ डॉलर में मिलेगी वह यहाँ उतने ही रुपयों में मिलेगी। भारत के लिए विदेशी कंप्यूटर कुछ ज़्यादा मेहेंगे थे, इसलिए शुरू से ही यहाँ ज़्यादातर कंप्यूटर "ब्रैन्डेड" नहीं "असेम्बल्ड" बिकते हैं, और हाँ असेम्बल्ड कंप्यूटरों में दिक्कतें थोड़ी ज़्यादा होतीं हैं, पर फिर कीमत भी तो है आधी। सोफ़्टवैर बनाने वाली कम्पनियों को यह अभी भी समझ में नहीं आया है कि पंद्रह हज़ार रूपए का कंप्यूटर खरीद कर कोई भी आठ हज़ार रूपए एक ऐसे सोफ्टवैर पर खर्च करके राज़ी नहीं होगा जिसे वह अपने किसी दोस्त से (या फिर उस असेम्बल्ड कंप्यूटर बनाने वाले से ही) आसानी से ले सकता है या तो मुफ़्त में या चंद रुपयों के लिए।

और यह बात फ़िल्मों की CD और DVD बेचने वाले लोगों को भी समझ में न आई, जो एक एक DVD चार चार सौ रूपए की बेचने की कोशिश में हैं। इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि ज़्यादातर लोग इन चीजों की प्राप्ति काले बाज़ारों से करतें हैं, और जिनके पास इंटरनेट की सुविधा है, विशेष रुप से वे जिनके पास "ब्रॉडबैंड" इंटरनेट की सुविधा है, वे इंटरनेट के काले बाज़ारों (यानी कि "टॉरेन्ट" साइट्स) से इनकी प्राप्ति करतें हैं।

पर अभ शायद धीरे धीरे दो बातें हो रहीं हैं। एक तो यह कि भारत में हर रोज़ बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की ताग़ाद बढ़ती जा रही है क्योंकि विदेशी कम्पनियों ने भी यह ठीक तौर से समझ लिया है कि अगर वे भारत के विशाल और बढ़ते हुए व््यापारी बाज़ार को देखा अनदेखा कर देंगे तो इसमें उनही की भूल होगी। सबसे ज़्यादा देखे जाने वाले ऐसे दो सेक्टर हैं गाड़ियों और मोबाइल फ़ोन के। दूसरी बात यह हो रही है कि भारतीय लोग खुद भी उद्यमकर्ता (आन्ट्रप्रनर) ज़्यादा बनने लगें हैं। और ऐसे काम का एक बहुत अच्छा उदाहरण है मोसरबेअर जिसका नाम सुनकर तो बिल्कुल भी हिन्दुस्तानी नहीं लगता पर जिसका, विकिपीडिया के मुताबिक, यहीं अपनी नई दिल्ली में जन्म हुआ था। अब यह राष्ट्र की सबसे बड़ी CD/DVD बनाने वाली कम्पनी है और दुनिया की दूसरी। और अब यह मोसरबेअर वाले और भी कुच्छ कमाल कर रहें हैं। आखिरकार किसी के भेजे में यह बात सज गई है कि कोई भी ४०० रूपए की एक फ़िल््म की DVD नहीं खरीदना चाहता। तो इन लोगों ने अब उन्हें पचास रूपए में बेचना शुरू कर दिया है। नयी फ़िल्मों में से अभी तो केवल एक ही है जिसे आप आज मोसरबेअर पर खरीद सकते हैं और वह है "जब वी मेट" जिसपर मैंने कल भरपूर टिप्पणी करी थी। परन्तु उनके पास मुग़ल-ए-आज़म और इस तरह की बहुत सी और पुरानी फ़िल्में भी उपलब्ध हैं। मोसरबेअर की अभी से ही कितनी लोकप्रियता बन चुकी है यह आज श्याम पता चला जब मैं DVD खरीदने एक दुकान पर पहुँचा और जितनी देर वहाँ था उतने में ही कम से कम पाँच छः लोग और अन्दर आ गए और सभी ने सबसे पहले यही पूछा कि मोसरबेअर वाली DVDs कहाँ हैं। (मेरा भी पहला सवाल यही था)

इससे अच्छा ठोस सबूत क्या चहिए यह साबित करने के लिए कि जब कुछ अच्छा बनेगा और सही दामों पर बिकेगा तो लोग कैसे नहीं खरीदेंगे।

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  • You are very right. Indians do not have low spending capabilities. But they always look for value for money. So if pirated discs outweigh the original dics in terms of their worthiness at their given price, obviously it will sell more than Indians. And actually this is seen in every product. Look at these CDs, DVDs or look at mobile phones or even look at Laptops and softwares.
  • Ur Braadband Piracy starts from ur very own IP ..!!
  • Man, yaar.
    It wouldn't have been possible for you to NOT write in Hindi, would it?
  • Nope, I'm not sure I correctly perceive your tone though.
  • Sorry, it's just that Hindi fonts in a computer are so much more harder to read cuz of the um, placement of the matras and words like 'कंप्यूटरो'ं where a sanyukt akshar would have been used normally.
  • Practically speaking, I could have written "computer" out in Latin letters, but, aesthetically speaking, I prefer that the entire article be in Devnagari script, even English loanwords.

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