ज़्यादातर लोगों को इस तरह की बातों में बिलकुल दिलचस्पी नहीं होगी पर मुझे बहुत दुख होता है यह देख कर की हमारी हिंदी बाषा किस दिशा में जा रही है. मेरी उम्र के लोगों ने तो लगता है हिंदी बोलना अब बंद ही कर दी है. मेरे बहुत से ऐसे दोस्त हैं, मैं उनसे हिंदी में बात शुरू करूंगा, पर वे अंग्रेजी में जवाब देंगे. और अगर मैं किसी से भी हिंदी में बात करूंगा तो कम से कम आधी बात तो अंग्रेजी के शब्दों से ही होगी. स्कूल, क्लास, कंप्यूटर, फ़ोन, बिल्डिंग, ऐसे हररोज़ इस्तिमाल होने वाले शब्द सब अंग्रेजी में बोले जातें हैं. कौन बोले "पाठशाला" या "कक्षा" या "दूरभाष"? और ऐसे ही शब्दों से मुझे सबसे ज्यादा दुख महसूस होता है. मेरे हिसाब से दुनिया में बहुत ही कम लोग होंगे जो हमसे भी कम अपनी मातृभाषा का उपयोग करते हैं. हाँ सिंगापुर एक अच्छा उदाहरण है, पर फिर वहां का हालचाल भी तो देखो - देश क्या ख़ाक दिल्ली से भी छोटा शहर है और दुनिया के कोने कोने से लोग आकर बस पड़ें हैं. फिर भी वहां के आम तौर चीनी लोगों की चीनी हमारी हिंदी से अच्छी है. क्यों? क्योंकि वे इस्तेमाल करते हैं, और इस्तेमाल करते हैं तो भाषा का अभ्यास होता है. अभ्यास होता है तो भाषा मन में और भी ज़्यादा मज़बूत होती जाती है. भाषा का उपयोग न करो तो इसका उल्टा असर होता है.
यह सब बातें मेरे दिमाग में हाल ही में फिरसे दौड़ आईं हैं क्योंकि इन हीं सब बातों की चर्चा मेरी कैंटोनीस कक्षा में हो रही थी. होन्ग कोंग में भी लोगों को लगने लगा है कि अंग्रेजी की वजह से उनकी भाषा पर पिछले कुछ सालों से बुरा असर पड़ने लगा है. हमारी कक्षा में अध्यापिकाजी ने हमें एक विडियो दिखाया जिसमें वे होन्ग कोंग में गए और बहुत सारे लोगों से पूछा कि कैंटोनीस में "present a report" कैसे बोलेंगे. लगभग सभी लोगों का पहला उत्तर था कि वे नहीं जानते कैसे बोलें, कि इस तरह की बात हमेशा अंग्रेजी में ही बोली जाती है, परन्तु अंत में ज़्यादातर लोगों ने थोड़ी देर सोचने के बाद ठीक शब्द ढूंढ लिए थे. मुझसे अगर यह पूछा जाए तो मैं तो हिंदी में न बोल पाऊँ यह वाक्य... "present" के बजाए तो शायद "प्रस्तुत" कह सकते हैं पर "report" तो बिलकुल ही कहना नहीं आता. और सोचा जाए तो यह कितने आसान शब्द हैं जो मैं बोलना चाहूं तो भी हिंदी में बोल नहीं पाऊंगा. हमारे बाद अगली पीढ़ी की हिंदी की तो और भी ज़्यादा वाट लगी होगी. कम से कम मैं हिंदी में समाचार तो समझ सकता हूँ, अगली पीढी के हिन्दुस्तानियों को तो बिलकुल भी अंदाज़ नहीं होगा कि "चरमपंथी", "अर्थ", "उद्योग", "गणतंत्र" जैसे शब्दों का माइने क्या होता है.
इसके ऊपर हिंदी को और भी लात मारना चाहते हो तो हिंदी को देवनागरी में लिखने के बजाए अंग्रेजी अक्षरों में लिख्लो. वैसे भी ज़्यादातर लोग अभ यह ही करतें हैं. ज़्यादातर लोगों को तो पता भी नहीं है कि कंप्यूटर पर हिंदी में लिखना कितना आसान है. बहुत लोग हैं जो यह पढ़ कर कहेंगे "क्या फरक पड़ता है? भाषा तो लोगों के साथ अपने मन की सोचों को पहुचाने का माध्यम है और वे कैसा भी माध्यम का उपयोग कर सकतें हैं." मेरे ख़याल से भाषा का उपयोग बस इतना ही नहीं होता है, बलकी भाषा के उपयोग का अंदाज़ भी बहुत महत्वपूर्ण होता है और बोलने वाले या लिखने वाले के बारे में बहुत कुछ बताता है. खैर, अंत में जो होगा सो होगा, पर हमारी इस हिंदी के भी दिन अब कम बचें हैं. जितना इस्तेमाल कर सकते हो कर लो.
यह सब बातें मेरे दिमाग में हाल ही में फिरसे दौड़ आईं हैं क्योंकि इन हीं सब बातों की चर्चा मेरी कैंटोनीस कक्षा में हो रही थी. होन्ग कोंग में भी लोगों को लगने लगा है कि अंग्रेजी की वजह से उनकी भाषा पर पिछले कुछ सालों से बुरा असर पड़ने लगा है. हमारी कक्षा में अध्यापिकाजी ने हमें एक विडियो दिखाया जिसमें वे होन्ग कोंग में गए और बहुत सारे लोगों से पूछा कि कैंटोनीस में "present a report" कैसे बोलेंगे. लगभग सभी लोगों का पहला उत्तर था कि वे नहीं जानते कैसे बोलें, कि इस तरह की बात हमेशा अंग्रेजी में ही बोली जाती है, परन्तु अंत में ज़्यादातर लोगों ने थोड़ी देर सोचने के बाद ठीक शब्द ढूंढ लिए थे. मुझसे अगर यह पूछा जाए तो मैं तो हिंदी में न बोल पाऊँ यह वाक्य... "present" के बजाए तो शायद "प्रस्तुत" कह सकते हैं पर "report" तो बिलकुल ही कहना नहीं आता. और सोचा जाए तो यह कितने आसान शब्द हैं जो मैं बोलना चाहूं तो भी हिंदी में बोल नहीं पाऊंगा. हमारे बाद अगली पीढ़ी की हिंदी की तो और भी ज़्यादा वाट लगी होगी. कम से कम मैं हिंदी में समाचार तो समझ सकता हूँ, अगली पीढी के हिन्दुस्तानियों को तो बिलकुल भी अंदाज़ नहीं होगा कि "चरमपंथी", "अर्थ", "उद्योग", "गणतंत्र" जैसे शब्दों का माइने क्या होता है.
इसके ऊपर हिंदी को और भी लात मारना चाहते हो तो हिंदी को देवनागरी में लिखने के बजाए अंग्रेजी अक्षरों में लिख्लो. वैसे भी ज़्यादातर लोग अभ यह ही करतें हैं. ज़्यादातर लोगों को तो पता भी नहीं है कि कंप्यूटर पर हिंदी में लिखना कितना आसान है. बहुत लोग हैं जो यह पढ़ कर कहेंगे "क्या फरक पड़ता है? भाषा तो लोगों के साथ अपने मन की सोचों को पहुचाने का माध्यम है और वे कैसा भी माध्यम का उपयोग कर सकतें हैं." मेरे ख़याल से भाषा का उपयोग बस इतना ही नहीं होता है, बलकी भाषा के उपयोग का अंदाज़ भी बहुत महत्वपूर्ण होता है और बोलने वाले या लिखने वाले के बारे में बहुत कुछ बताता है. खैर, अंत में जो होगा सो होगा, पर हमारी इस हिंदी के भी दिन अब कम बचें हैं. जितना इस्तेमाल कर सकते हो कर लो.
Labels: Hindi
4 comments
-
This post has been removed by the author.
-
तुमने मेरे मुह की बात छीन ली। कई दिनों से बिलकुल यही बात मुझे सता रही थी, हो मैंने हर रोज़ हिन्दी लिखने और पढ़ने का फैसला किया और हिंदुस्तान से हिन्दी की किताब भी मंगवाई है।
पता नहीं कब हम हिन्दुस्तानी अपनी संस्कृति का आदर व् कदर करने लगेंगे। -
मैं भी बहुत दिनों से इन बातों के बारे में लिखने की सोच रहा था. पर कल यह लेख (http://tinyurl.com/multilingual-fb) देखने के बाद मुझे लगा कि अब तो इसके बारे में बस लिख ही लेना चाहिए. इस लेख में लिखा है कि फेसबुक अब ६ हिन्दुस्तानी भाषाओं में उपलब्ध है, और मेरे दिमाग में इसे पढ़ने के बाद पहली सोच यह आयी कि इन ६ भाषाओं को कौन इस्तेमाल करेगा. मैं एक भी हिन्दुस्तानी को नहीं जानता जो कंप्यूटर पर कुछ भी हिंदी (या उर्दू या पंजाबी या गुजराती) में करता हो. और यही कारण है इस बात का कि विन्डोज़ और मैक दोनों पर हिंदी का हल कितना खराब है. वैसे सच बोलूँ तो मैक और विन्डोज़ पर जितनी सहूलियत है हिंदी के लिए, ये भी ज़्यादा ही है क्योंकि इस्तेमाल करने वाले लोग बहुत ही कम हैं. अगर हम अपनी भाषा इस्तेमाल ही नहीं करेंगे तो कौन घास डालेगा. सॉफ्टवेर बनाने में आखिरकार अच्छे खासे पैसे लगते हैं.
-
इसीलिए महाविद्यालयों में नए छात्रों से "अनौपचारिक भेंट" में उन सबसे उनका पूरा जीवन-लेखा हिंदी में बुलवाने की प्रथा का और प्रचार होना चाहिए, यहाँ बिरला प्रौद्योगिकी एवं विज्ञान संस्थान में प्रथम वर्ष छात्रों से पहला काम यही कराया जाता है :P
दो तीन वर्षों बाद तुम्हारे ब्लॉग पे दोबारा आना हुआ. पीछे वाले लेख पढ़ रहा हूँ :D
PS: रिपोर्ट शब्द हिंदी के शब्द 'रपट' से उत्पन्न हुआ है.

