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मुझे लगता है कि मेरे चीनी पढ़ने से मुझे सबसे ज़्यादा लाभ हुआ है अपनी ही इस हिन्दी भाषा को बेहतर समझने में. चीनी और हिन्दी भाषाओं में समानता से अंतर ज़्यादा हैं, लेकिन जो समानताएं हैं, वे बहुत ही रोचक हैं.

दोनों भाषाओं में एक बहुत ही दिलचस्प चीज़ है यह "मोडल पार्टिकल" की संकल्पना. मोडल पार्टिकल एक भाषाविदों के इस्तेमाल का शब्द है और इसका मतलब लगभग है एक छोटा सा शब्द जो अपने आप से एक वाक्य में ज़्यादा माइने नहीं रखता, परन्तु जिसका वाक्य के समग्र तात्पर्य पर प्रभाव पड़ता है. नीचे दीये गए इन चंद उदाहरणों से आपको समझ आ जाएगा मैं क्या कह रहा हूँ:

"यह बहुत ज़्यादा है, मुझसे और नहीं खाया जाएगा, तुम खालो ना."
"तुम खेलने क्यों नहीं आये?" "अरे भाई, मैं कल के टेस्ट के लिए पढ़ाई कर रहा था ना!"
"तुमने ठंडे दिमाग़ से सोच लिया है ना?"
"हैं! तुम पागल हो गए हो क्या?"
"आज तो मेरे पास टाईम नहीं है, मैं कल आता हूँ हाँ."
"हे भगवान्, तूने यह क्या कर डाला रे..."
"क्या है भाई?"

इन उदाहरणों में, जो शब्द मोटे अक्षरों में लिखे हुए हैं, वे "मोडल पार्टिकल" कहलाए जातें हैं (कम से कम, मेरे हिसाब से, इनको हिन्दी में मोडल पार्टिकल माना जाना चाहिए). इन शब्दों का काम होता है बोली में भावना डालना. अंग्रेजी में ऐसे शब्दों का ज़्यादा इस्तेमाल नहीं होता है, और मुझे लगता है कि इस ही लिए मैं जब गुस्सा होता हूँ, तो हिन्दी में ज़्यादा आसानी से दूसरे व्यक्ती तक अपनी भावनाएं पहुंचा सकता हूँ. ये शब्द वाक्य में केवल भावना डालने के लिए होतें हैं, इस बात का एक अच्छा सबूत यह है कि ऊपर लिखे उदाहरणों का मूल मतलब इन शब्दों को निकालने के बाद भी बिलकुल नहीं बदलता.

ऐसे शब्द चीनी और जापानी में भी भरे पड़ें हैं. चीनी में इन्हें "语气词" (यू-छी-थ्स) बुलाया जाता है जिसका अनुवाद होगा "भाषा भावना शब्द". जापानी में इन्हें "叙法の助詞" (जोहो-नो-जोशि) या "मोडल सहायक शब्द" बुलाया जाता है. इनके बारे में ज़्यादा जानकारी के लिए, विकिपीडिया पर भाषाविज्ञान से सम्बंधित लेख पढ़ सकतें हैं, परन्तु विकिपीडिया पर भी इन चीज़ों की जानकारी अभी बहुत कम है.

इस लेख का सम्पादन रुंगटा के हिन्दी ट्रांस्लिटरेशन उपकरण के द्वारा हुआ है.

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मैं बहुत हैरान हूँ यह देख कर कि कुछ ही सालों पहले के मुकाबले में आजकल इन्टरनेट पर हिन्दी में बातचीत करने के लिए सुविधाओं की सच में बहुत बेहतरी हो गई है। आज मैं चंद "इन्टरनेट यंत्रों" को आपके सामने पेश करूंगा।

पहला है Google Indic Transliteration। इसकी चर्चा मैंने पहले भी बहुत की है, पर जितना कहा जाए कम है। इसका इस्तेमाल करके आप हिन्दी में लेखों की रचना कर सकतें हैं, और किसी भी कंप्यूटर पर, क्योंकि गूगल की ज़्यादातर सुविधाओं की तरह यह भी आपके इन्टरनेट ब्राउज़र के अन्दर काम करता है। और यह केवल हिन्दी नहीं, बल्कि बहुत सी अन्य भाषाओं में भी उपलब्ध है, इसलिए आप चाहें तो बंगाली, गुजराती, कन्नड़, मलयालम, मराठी, नेपाली, तमिल व तेलुगु में भी संचार कर सकतें हैं।

दूसरा योग्य यंत्र है हिन्दी Firefox। Firefox अब मेरे कंप्यूटर पर केवल दूसरा ही ऐसा प्रोग्राम है जो सर से पाऊँ तक हिन्दी में है (पहला ऐसा प्रोग्राम मैंने ख़ुद ही बनाया था)। यह अपने आप में कोई ख़ास बात नहीं है, परन्तु क्योंकि मेरा इतने सालों से लिखित हिन्दी से तालुक़ नहीं रहा है, मेरी हिन्दी पढ़ने की रफ़्तार बहुत ही धीमी हो गयी है। हिन्दी Firefox के लगातार उपयोग का लाभ यह है कि मेरा हिन्दी के साथ लगातार संपर्क बना रहता है, और हिन्दी में कुछ तकनीकी शब्द भी सीखने को मिल जाते हैं।

तीसरा यंत्र भी पहले की तरह एक वेबसाइट है। आजकल बहुत सारे हिन्दी के शब्द मुझे जल्दी से याद नहीं आते हैं (आठवी कक्षा से अभ्यास जो नहीं किया है)। एक शब्दकोष हो तो आसानी से उन शब्दों को खोज सकतें हैं जो याद में न आ रहे हों। shabdkosh.org मेरे ख़याल से इन्टरनेट पर सबसे अच्छा हिन्दी शब्दकोष है और मैं हिन्दी लेख लिखने के समय इसे हमेशा खोले रखता हूँ। गूगल ने भी हाल ही में हिन्दी में अनुवाद सुविधा खोली है और यह भी एक उत्तम सुविधा है। अगर आप हिन्दी शब्दकोष किताबी रूप में खरीदना चाहतें हैं तो मेरे ख़याल से आपको दो अलग अलग किताबें खरीदनी पड़ेंगी। मैं इन दो किताबों का उपयोग करता हूँ: हिन्दी-अंग्रेज़ीअंग्रेज़ी-हिन्दी

चौथा है गूगल का Google Talk Transliteration यंत्र। इसका उपयोग करके आप गूगल टॉक इस्तेमाल करने के समय हिन्दी में बातचीत कर सकतें हैं। ऐसा ही एक और यंत्र Blogger Gmail में भी उपलब्ध है, इनकी सहायता से आप अपने लेख हिन्दी में लिख सकतें हैं (मेरी तरह!)।

एक आखरी चीज़ है जो Mac के उपयोगकर्ताओं के कम आएगी। आप System Preferences > International में जाकर, Edit List बटन दबा कर हिन्दी भाषा को भी भाषाओं की सूची में डाल सकतें हैं, और अगर हिन्दी को सूची में सबसे ऊपर वाले खाने में रखेंगे तो वे वेबसाइटें जिनका हिन्दी वर्णन उपलब्ध है वे हिन्दी में प्रकाषण होंगी। गूगल की ज़्यादातर वेबसाईटें हिन्दी में उपलब्ध हैं और बहुत सी अन्य साईटें भी हिन्दी में उपलब्ध हैं, जैसे meebo.comगूगल समाचार

आशा है कि यह यंत्र आपके काम आएँगे!

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  • तुम्हारी हिंदी में लिखने की चाह सराहनीये है परन्तु तुम हिंदी की posts (लेखों?) में उर्दू के शब्दों का बहुत प्रयोग करते हो.
    तब भी तुम्हारे लेख देखकर मुझ में भी हिंदी में लिखने की चाह जाग उठी है :-)
  • BTW मैं अपने computer पर http://www.baraha.com/ का प्रयोग करता हूँ.
  • मेरी बात सुनो तो उर्दू और हिन्दी में कोई अंतर न करो. ज़्यादातर (अधिकतम बोलूँ क्या?) हिन्दुस्तानी लोग उर्दू के शब्द इस्तेमाल (उपयोग बोलूँ क्या?) किये बगैर एक दिन भी नहीं बिता सकते. सख्त तौर से देखा जाए तो "आम" जैसे आम शब्द भी उर्दू के हैं. अगर मेरी हिन्दी से उर्दू के शब्द निकाल लोगे तो तुम मेरे मुँह से आधी से ज़्यादा बातें छीन लोगे.
  • @Karan
    आप ने सही कहा के उर्दू और हिन्दी में कोई ज़्यादा अंतर नहीं है. सिर्फ़ लिपि का फ़र्क़ है. यही वजह है के मैं उर्दू के साथ साथ हिन्दी में भी ब्लॉग्गिंग करता हूँ.

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ज़्यादातर लोगों को इस तरह की बातों में बिलकुल दिलचस्पी नहीं होगी पर मुझे बहुत दुख होता है यह देख कर की हमारी हिंदी बाषा किस दिशा में जा रही है. मेरी उम्र के लोगों ने तो लगता है हिंदी बोलना अब बंद ही कर दी है. मेरे बहुत से ऐसे दोस्त हैं, मैं उनसे हिंदी में बात शुरू करूंगा, पर वे अंग्रेजी में जवाब देंगे. और अगर मैं किसी से भी हिंदी में बात करूंगा तो कम से कम आधी बात तो अंग्रेजी के शब्दों से ही होगी. स्कूल, क्लास, कंप्यूटर, फ़ोन, बिल्डिंग, ऐसे हररोज़ इस्तिमाल होने वाले शब्द सब अंग्रेजी में बोले जातें हैं. कौन बोले "पाठशाला" या "कक्षा" या "दूरभाष"? और ऐसे ही शब्दों से मुझे सबसे ज्यादा दुख महसूस होता है. मेरे हिसाब से दुनिया में बहुत ही कम लोग होंगे जो हमसे भी कम अपनी मातृभाषा का उपयोग करते हैं. हाँ सिंगापुर एक अच्छा उदाहरण है, पर फिर वहां का हालचाल भी तो देखो - देश क्या ख़ाक दिल्ली से भी छोटा शहर है और दुनिया के कोने कोने से लोग आकर बस पड़ें हैं. फिर भी वहां के आम तौर चीनी लोगों की चीनी हमारी हिंदी से अच्छी है. क्यों? क्योंकि वे इस्तेमाल करते हैं, और इस्तेमाल करते हैं तो भाषा का अभ्यास होता है. अभ्यास होता है तो भाषा मन में और भी ज़्यादा मज़बूत होती जाती है. भाषा का उपयोग न करो तो इसका उल्टा असर होता है.

यह सब बातें मेरे दिमाग में हाल ही में फिरसे दौड़ आईं हैं क्योंकि इन हीं सब बातों की चर्चा मेरी कैंटोनीस कक्षा में हो रही थी. होन्ग कोंग में भी लोगों को लगने लगा है कि अंग्रेजी की वजह से उनकी भाषा पर पिछले कुछ सालों से बुरा असर पड़ने लगा है. हमारी कक्षा में अध्यापिकाजी ने हमें एक विडियो दिखाया जिसमें वे होन्ग कोंग में गए और बहुत सारे लोगों से पूछा कि कैंटोनीस में "present a report" कैसे बोलेंगे. लगभग सभी लोगों का पहला उत्तर था कि वे नहीं जानते कैसे बोलें, कि इस तरह की बात हमेशा अंग्रेजी में ही बोली जाती है, परन्तु अंत में ज़्यादातर लोगों ने थोड़ी देर सोचने के बाद ठीक शब्द ढूंढ लिए थे. मुझसे अगर यह पूछा जाए तो मैं तो हिंदी में न बोल पाऊँ यह वाक्य... "present" के बजाए तो शायद "प्रस्तुत" कह सकते हैं पर "report" तो बिलकुल ही कहना नहीं आता. और सोचा जाए तो यह कितने आसान शब्द हैं जो मैं बोलना चाहूं तो भी हिंदी में बोल नहीं पाऊंगा. हमारे बाद अगली पीढ़ी की हिंदी की तो और भी ज़्यादा वाट लगी होगी. कम से कम मैं हिंदी में समाचार तो समझ सकता हूँ, अगली पीढी के हिन्दुस्तानियों को तो बिलकुल भी अंदाज़ नहीं होगा कि "चरमपंथी", "अर्थ", "उद्योग", "गणतंत्र" जैसे शब्दों का माइने क्या होता है.

इसके ऊपर हिंदी को और भी लात मारना चाहते हो तो हिंदी को देवनागरी में लिखने के बजाए अंग्रेजी अक्षरों में लिख्लो. वैसे भी ज़्यादातर लोग अभ यह ही करतें हैं. ज़्यादातर लोगों को तो पता भी नहीं है कि कंप्यूटर पर हिंदी में लिखना कितना आसान है. बहुत लोग हैं जो यह पढ़ कर कहेंगे "क्या फरक पड़ता है? भाषा तो लोगों के साथ अपने मन की सोचों को पहुचाने का माध्यम है और वे कैसा भी माध्यम का उपयोग कर सकतें हैं." मेरे ख़याल से भाषा का उपयोग बस इतना ही नहीं होता है, बलकी भाषा के उपयोग का अंदाज़ भी बहुत महत्वपूर्ण होता है और बोलने वाले या लिखने वाले के बारे में बहुत कुछ बताता है. खैर, अंत में जो होगा सो होगा, पर हमारी इस हिंदी के भी दिन अब कम बचें हैं. जितना इस्तेमाल कर सकते हो कर लो.

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  • तुमने मेरे मुह की बात छीन ली। कई दिनों से बिलकुल यही बात मुझे सता रही थी, हो मैंने हर रोज़ हिन्दी लिखने और पढ़ने का फैसला किया और हिंदुस्तान से हिन्दी की किताब भी मंगवाई है।

    पता नहीं कब हम हिन्दुस्तानी अपनी संस्कृति का आदर व् कदर करने लगेंगे।
  • मैं भी बहुत दिनों से इन बातों के बारे में लिखने की सोच रहा था. पर कल यह लेख (http://tinyurl.com/multilingual-fb) देखने के बाद मुझे लगा कि अब तो इसके बारे में बस लिख ही लेना चाहिए. इस लेख में लिखा है कि फेसबुक अब ६ हिन्दुस्तानी भाषाओं में उपलब्ध है, और मेरे दिमाग में इसे पढ़ने के बाद पहली सोच यह आयी कि इन ६ भाषाओं को कौन इस्तेमाल करेगा. मैं एक भी हिन्दुस्तानी को नहीं जानता जो कंप्यूटर पर कुछ भी हिंदी (या उर्दू या पंजाबी या गुजराती) में करता हो. और यही कारण है इस बात का कि विन्डोज़ और मैक दोनों पर हिंदी का हल कितना खराब है. वैसे सच बोलूँ तो मैक और विन्डोज़ पर जितनी सहूलियत है हिंदी के लिए, ये भी ज़्यादा ही है क्योंकि इस्तेमाल करने वाले लोग बहुत ही कम हैं. अगर हम अपनी भाषा इस्तेमाल ही नहीं करेंगे तो कौन घास डालेगा. सॉफ्टवेर बनाने में आखिरकार अच्छे खासे पैसे लगते हैं.
  • इसीलिए महाविद्यालयों में नए छात्रों से "अनौपचारिक भेंट" में उन सबसे उनका पूरा जीवन-लेखा हिंदी में बुलवाने की प्रथा का और प्रचार होना चाहिए, यहाँ बिरला प्रौद्योगिकी एवं विज्ञान संस्थान में प्रथम वर्ष छात्रों से पहला काम यही कराया जाता है :P

    दो तीन वर्षों बाद तुम्हारे ब्लॉग पे दोबारा आना हुआ. पीछे वाले लेख पढ़ रहा हूँ :D
    PS: रिपोर्ट शब्द हिंदी के शब्द 'रपट' से उत्पन्न हुआ है.

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यह हो गया इस नए ब्लॉल पर दो सौ एकवां लेख (जनवरी २००६ से), और इसके साथ आते हैं इक्के दुक्के छोटे मोटे बदलाव। सबसे आसानी से दिख जाने वाला है मैं जिन तीन भाषाओं में लेख लिखता हूँ, उन भाषाओं के चुनाव की सुविधा, क्योंकि मेरे ज़्यादातर दोस्त या तो हिन्दी या चीनी के लेखों की ओर बिलकुल भी श्रद्धा नहीं रखते हैं। दूसरी आसानी से दिख जाने वाली चीज़ यह हुई कि इस ब्लॉग का विश्वजालीय इंटरनेट पता बदल गया है। क्यों? ऐंवई।

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विदाई लेने का समय फिरसे आ गया है। आज की तारीख़ हुई मई 27, तो अब जून 11 के आने में कुच्छ ही दिन और हैं। गर्मियाँ शुरू होते ही हमारे hostel के लगभग 200 लोग अलग अलग जगह जाकर काम पर लग जाएंगे और सितम्बर में जब लौट के आएँगे तो सब अपनी नई नई जगहों में होंगे। हर साल की तरह ये साल भी बहुत ही जल्दी बित गया, और हर साल की तरह इस साल भी कुछ पुराने दोस्तों से दोस्ती छूटी और बहुत सारे नए लोगों से दोस्ती बनी। पर it's not really because I actively willed it or something. This is just something that seems to happen because I feel I only have a finite दोस्त capacity and having a small number of really good ones is what satisfies me most. इस साल जो दोस्त बनें हैं वे मेरे खयाल से exceptionally अच्छें हैं, और क्योंकि उनमें से बहुत सारे अगले साल campus के दूसरे कोने में होंगे, unfortunately, लगता है कि अगले साल मेरा entertainment थोड़ा low रहेगा।

खैर उदासी जो उदासी साल के खतम होने से कुच्छ अच्छी बातें भी होतीं हैं, namely, बस कुछ ही exams और homeworks की छोटी सी नदी पार करने के लिए बची है, जिसके बाद 9 जून से WWDC और 16 जून से internship शुरू हो जाएगी। WWDC attend करने के लिये भी मुझे बहुत खून पसीना बहाना पड़ा है क्योंकि वो और हमारे exams एक साथ शुरू होतें हैं और Steve Jobs के keynote को personally देखने के लिए (शायद! ये भी पक्का नहीं है क्योंकि मुझे नहीं पता कि student scholarship वाले लोगों को पैसे देने वाले लोगों के मुक़ाबले equal treatment मिलता है कि नहीं) बहुत खून और पसीना बहाया है। मेरे सारे exam ज़्यादातर लोगों के exam शुरू होने से पहले ही खतम हो जाएँगे क्योंकि एक तो इसी गुरुवार को है, एक अगले शुक्रवार को और एक अगले रविवार को है। Hopefully, it will live up to all its hype. It is apparently "sold out" this year which is a first, and I'm sure iPhone developers will also be there by the bucketload. Basically, I hope all this rescheduling effort is worth the pain and possibly worse grades due to early exams. 16 more glorious days before "the summer".

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  • Don't mean to lower your hopes but the student scholarship awardees from Australia were moved to another room during the keynote last year. Let's hope you get a better treatment.
  • haha, I don't have too much hope for it; after all, I'm not a paying customer. :-P
  • Well during my time, I got up at 5 in the morning to line up early...and we sat right behind the usual VIPs. So he was barely 10 rows away. So I'd suggest reaching there as early as possible.

    By the way, the hindi-english alternation(if such a word exists) does make an ordinary sentence sound funny!..lol.

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इंडिया में एक बड़ी मुश्किल यह है कि जब विदेशी चीज़ें यहाँ लाकर बेचीं जातीं हैं तो उनके दाम भी वही विदेशी दाम होतें हैं, और इस ही लिए, अगर सौफ़्टवैर का उदाहरण लिया जाये तो मेरे ख्याल से तो पाईरसी का सबसे बड़ा कारण तो यह ही है कि जो माईक्रोसौफ़्ट विन्डोज़ अमरीका में दो सौ डॉलर में मिलेगी वह यहाँ उतने ही रुपयों में मिलेगी। भारत के लिए विदेशी कंप्यूटर कुछ ज़्यादा मेहेंगे थे, इसलिए शुरू से ही यहाँ ज़्यादातर कंप्यूटर "ब्रैन्डेड" नहीं "असेम्बल्ड" बिकते हैं, और हाँ असेम्बल्ड कंप्यूटरों में दिक्कतें थोड़ी ज़्यादा होतीं हैं, पर फिर कीमत भी तो है आधी। सोफ़्टवैर बनाने वाली कम्पनियों को यह अभी भी समझ में नहीं आया है कि पंद्रह हज़ार रूपए का कंप्यूटर खरीद कर कोई भी आठ हज़ार रूपए एक ऐसे सोफ्टवैर पर खर्च करके राज़ी नहीं होगा जिसे वह अपने किसी दोस्त से (या फिर उस असेम्बल्ड कंप्यूटर बनाने वाले से ही) आसानी से ले सकता है या तो मुफ़्त में या चंद रुपयों के लिए।

और यह बात फ़िल्मों की CD और DVD बेचने वाले लोगों को भी समझ में न आई, जो एक एक DVD चार चार सौ रूपए की बेचने की कोशिश में हैं। इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि ज़्यादातर लोग इन चीजों की प्राप्ति काले बाज़ारों से करतें हैं, और जिनके पास इंटरनेट की सुविधा है, विशेष रुप से वे जिनके पास "ब्रॉडबैंड" इंटरनेट की सुविधा है, वे इंटरनेट के काले बाज़ारों (यानी कि "टॉरेन्ट" साइट्स) से इनकी प्राप्ति करतें हैं।

पर अभ शायद धीरे धीरे दो बातें हो रहीं हैं। एक तो यह कि भारत में हर रोज़ बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की ताग़ाद बढ़ती जा रही है क्योंकि विदेशी कम्पनियों ने भी यह ठीक तौर से समझ लिया है कि अगर वे भारत के विशाल और बढ़ते हुए व््यापारी बाज़ार को देखा अनदेखा कर देंगे तो इसमें उनही की भूल होगी। सबसे ज़्यादा देखे जाने वाले ऐसे दो सेक्टर हैं गाड़ियों और मोबाइल फ़ोन के। दूसरी बात यह हो रही है कि भारतीय लोग खुद भी उद्यमकर्ता (आन्ट्रप्रनर) ज़्यादा बनने लगें हैं। और ऐसे काम का एक बहुत अच्छा उदाहरण है मोसरबेअर जिसका नाम सुनकर तो बिल्कुल भी हिन्दुस्तानी नहीं लगता पर जिसका, विकिपीडिया के मुताबिक, यहीं अपनी नई दिल्ली में जन्म हुआ था। अब यह राष्ट्र की सबसे बड़ी CD/DVD बनाने वाली कम्पनी है और दुनिया की दूसरी। और अब यह मोसरबेअर वाले और भी कुच्छ कमाल कर रहें हैं। आखिरकार किसी के भेजे में यह बात सज गई है कि कोई भी ४०० रूपए की एक फ़िल््म की DVD नहीं खरीदना चाहता। तो इन लोगों ने अब उन्हें पचास रूपए में बेचना शुरू कर दिया है। नयी फ़िल्मों में से अभी तो केवल एक ही है जिसे आप आज मोसरबेअर पर खरीद सकते हैं और वह है "जब वी मेट" जिसपर मैंने कल भरपूर टिप्पणी करी थी। परन्तु उनके पास मुग़ल-ए-आज़म और इस तरह की बहुत सी और पुरानी फ़िल्में भी उपलब्ध हैं। मोसरबेअर की अभी से ही कितनी लोकप्रियता बन चुकी है यह आज श्याम पता चला जब मैं DVD खरीदने एक दुकान पर पहुँचा और जितनी देर वहाँ था उतने में ही कम से कम पाँच छः लोग और अन्दर आ गए और सभी ने सबसे पहले यही पूछा कि मोसरबेअर वाली DVDs कहाँ हैं। (मेरा भी पहला सवाल यही था)

इससे अच्छा ठोस सबूत क्या चहिए यह साबित करने के लिए कि जब कुछ अच्छा बनेगा और सही दामों पर बिकेगा तो लोग कैसे नहीं खरीदेंगे।

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  • You are very right. Indians do not have low spending capabilities. But they always look for value for money. So if pirated discs outweigh the original dics in terms of their worthiness at their given price, obviously it will sell more than Indians. And actually this is seen in every product. Look at these CDs, DVDs or look at mobile phones or even look at Laptops and softwares.
  • Ur Braadband Piracy starts from ur very own IP ..!!
  • Man, yaar.
    It wouldn't have been possible for you to NOT write in Hindi, would it?
  • Nope, I'm not sure I correctly perceive your tone though.
  • Sorry, it's just that Hindi fonts in a computer are so much more harder to read cuz of the um, placement of the matras and words like 'कंप्यूटरो'ं where a sanyukt akshar would have been used normally.
  • Practically speaking, I could have written "computer" out in Latin letters, but, aesthetically speaking, I prefer that the entire article be in Devnagari script, even English loanwords.

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पिछले जितनी भी बार मैं दिल्ली आया हूँ, हमेशा यह एक माल पुआ खाने की तमन्ना रहती थी, जो आखिरकार कल रात पूरी हो गई। हाँ, प्लान के मुताबिक सब कुच्छ एकदम परफ़ेक्ट तो नहीं हुआ क्योंकि हल्दीराम के पास रबड़ी खतम हो गई थी और वहाँ पर दस मिनट प्रतीक्षा करने की बात थी। रबड़ी के लिए इन्तेय्ज़ार या फिर रबड़ी को गोली मारकर घर लौटना? घर लौटना। घर पहुंचकर और एक कठिनाई सामने आई, और वह यह थी कि घर पर नानी ने बनाई हुई थी गाजर की खीर। अब दोनो चीज़ें - खीर और माल पुआ - एक के बाद एक खाईं जाएँ तो बहुत अति लगेगी, इसलिए मैंने यह निर्णय लिया कि माल पुए के साथ रबड़ी की तरह गाजर की खीर खाई जाए, और क्या बताऊँ, बहुत ही स्वादिष्ट कॉम्बिनेशन है यह यार! अगर माल पुआ और मेरी नानी की बनाई हुई गाजर की खीर कहीं मिले तो अवश्य खा के देखियेगा।

चीनियों से कहाँ कहाँ भागेंगे
खैर, यह तो रही माल पुए की बात, इसके अलावा, और क्या गल करनी है? हाँ, मेरा और चीनी लोगों से तो अब कुछ अटूट सा बन्धन बन गया है। वैसे तो मैने दिल्ली में सत्रह सालों में एक भी चीनी इंसान नहीं देखा होगा, मगर अब जब चीनी पढ़नी शुरू कर दी है तो चीनी लोग मेरे घर चाय पीने आने लगे हैं। ऐसा हुआ कि पिताजी का अस्पताल कोई महासम्मेलन (कॉन्फ़रेन्स) आयोजित कर रहा था और उसी चक्कर में उन्होनें शांघाई से दो नामी ग्रामी चीनी डॉक्टरों को आने का न्यौता दिया था। तो मेरे पिताजी एक श्याम आकर मुझसे कहतें हैं कि वे दो चीनियों को गोपाला के रस गुल्ले खिलाने जा रहे है और पूछ्तें हैं कि मुझे उनसे से मिलने की इच्छा है कि नहीं। अवश्य जाएंगे रस गुल्ले खिलाने भाई! फिर गए हम और मिले चीनियों से, बड़ा मज़ा आया क्योंकि उन्होंनें तो किसी सपने में भी नहीं सोचा था कि उनको भारत में कोई चीनी बोलने वाला व्यक्ति मिलेगा। उनसे थोड़ी देर बात करी तो पता चला कि उनकी भी अंग्रेजी कोई टॉप-क्लास नहीं थी और मुझे बड़ा मज़ा आया क्योंकि उन्होंनें न केवल मुझे कुच्छ शब्दों को चीनी से अंग्रेजी में बदलनें का अवसर दिया और अंग्रेजी के कुच्छ सवालात पूछे, और तो और, मुझे दो चीनी किताबें भी भेंट कर दीं। उन्हें यह जानकार भी बड़ी प्रसन्नता हुई कि मैं उनकी भाषा पढ़ लिख भी सकता था और उन्होंनें अपने मनोरंजन के लिए मुझसे कुच्छ शब्द पढ़वाए। बातों ही बातों में यह पता चला कि उनमें से एक का एक बेटा भी है और वे कह रहे थे कि उसकी पांचवी कक्षा की गणित उनकी खुद की गणित के मुक़ाबले में अभी से ही कितनी भयानक हो गई है। (वैसे तो मैंने इस शब्द को "भयानक" लिखा है पर यह असलियत में चीनी का एक ऐसा अनोखा शब्द है जिसकी किसी और भाषा में ठीक तरह से बदलाव नहीं किया जा सकता है। मूल चीनी में इसे "लीहाई" (厉害) बोला जाता है, और इसका अंग्रेजी में सबसे अच्छा करण "फ़ौरमिडेबल" है। यह शब्द दोनों अच्छी और बुरी खूबियों का वर्णन करने के लिए इस्तेमाल होता है।)

जब वी मेट
सबसे पहले तो इस पिक्चर के नाम का हिन्दी-करण थोड़ा सा... हाँ, मुझे लगता है आप स्वयं देख सकतें हैं इसमें क्या खासियत है। नाम के अलावा, मैंने पिक्चर इसलिए देखी क्योंकि बहुत लोगों का कहना था कि अच्छी फ़िल्म है और आमतौर की फ़िल्मों से थोड़ी हट के है। कि यह फ़िल्म अच्छी बनी है, इस दावे पर मैं कोई आपत्ति नहीं जताऊंगा, परन्तु मुझे लोगों की चर्चा सुनकर ऐसा प्रतीत हुआ था कि यह फ़िल्म कुच्छ अलग होगी और फ़िल्म के इस दावे को मैं दुर्भाग्य से अपनी सहमती नहीं दे सकता। हाँ, गाने अच्छे थे, कलाकारी भी अच्छी थी, मगर ऐसी कोई बात नहीं हुई जिसको मैं देखकर यह कह सकूं कि हाँ इस फ़िल्म की कहानी तो सच में सर्व श्रेष्ठ है। हाँ, अगर फ़िल्म देखने के समय मन में ऐसी कोई अपेक्षा न होती तो वह थोड़ी और पसंद आती, मगर फ़िल्म तो मेरे ख्याल से अच्छी बनी है, मनोरंजक है और बहुत देखने लायक है। कुच्छ गाने भी बहुत अच्छे हैं जैसे "आओ मिलो चलो", "तुम से ही" और "ये इश्क़ हाए"।

२००८
वैसे साल २००८ तो आ गया है, तो अब कुछ हफ़्तों के लिए ग़लत तारीख़ जगह जगह लिखनी ही पड़ेगी, और कुछ नव वर्ष के दृढ़ निश्चय बनाने होंगे। मेरी बात सुनिए तो ज़्यादा भारी भरकम प्लान न बनाईयेगा क्योंकि इनकी पूरे होने की संभावना थोड़ी कम ही रहती है। (यह ऐतिहासिक रुप से साबित की हो चुकी सच्चाई है।)

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  • बढ़े दिनो बाद हिन्दी में लिखे हो। पढ़ के बहुत आनंद मिला। चीनी लोगो से तो तुमने रिशता ही बना लिया है!!!
  • भाई यह लेख पढ कर तोह मूँह मेँ पानी आगया । जी तोह चाहता है कि अभी भारत की टिकट करवाऊँ अौर उतरते ही गोलगप्पे, मालपुअा, रसमलाई अादि खाऊँ ।

    जहाँ तक रही चलचित्रों की बात है, मैं 'तारे जमिन पर' देखने कि सलाह दूँगा । बडी प्यारी अौर दिल को छू देने वाली चलचित्र है ।

    अौर हाँ, नया साल मँगल-मय हो !
  • आदित्यजी, आपने भी बड़ा एक तोप शब्द इस्तेमाल किया है "चलचित्र", पहले कभी सुना तो नहीं है. पहले सोचा कि आपका अपना आविष्कार होगा, इसलिए अच्छा है कि मैंने शब्दकोष से सम्पर्क कर लिया. मैंने भी "तारे ज़मीन पर" की बहुत चर्चा सूनी है मगर यह भी सुना है कि सिनेमा के अन्दर जाओ तो रुमाल लेकर. फ़िल्मों की ही बात कर रहें हैं तो मैंने एक "चक दे इंडिया" फ़िल्म की भी काफ़ी चर्चा सुनी है और आज मैं उसकी DVD खरीद लाया हूँ देखने के लिए.

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30-second comedy at its best. (Follow-up)

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हार्दिक स्टाइल में!
आज के दिन हमारे प्रधान मंत्री ने प्रात: काल उठकर भाषण दिया होगा। अभी सारे भारत में हर जगह लाखों पतंगें उड़ रहीं होंगी। मैंने माताजी और पितजी से स्काईप पर बात की। और अभ जितनी हिन्दी याद है उसका उपयोग करके मैं यह ब्लॉग संदेश धीरे धीरे लिख रहाँ हूँ। सुना है कि गूगल भारत के लिए किसी नई सेवा का आयोजन करने वाला है।

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क्या बताऊँ, अब एक महीने से ज़्यादा हो गया है जबसे मैंने यहाँ अपनी पिछली substantial entry लिखी थी। और यह महीना भी क्या बीता है। जब भी मुझे कुछ लिखने का मन हुआ कुछ और काम करना भी साथ ही साथ याद आ गया और फिर बस fun के लिए लिखने को justify नहीं कर सका।

खैर, देखतें हैं मैंने अप्रैल से लेकर जून में क्या किया? पहली बात तो अगले साल मैं एक hostel में RCC बन रहाँ हूँ। यह बन्दे का फ़न्डा basically यह होता है कि किसी को कम्प्यूटर शम्प्यूटर की problem होती है तो इस बन्दे के पास जातें हैं और वह सब कुछ अच्छा कर देता है। वैसे भी मुझे troubleshooting अच्छी लगती है, तो मैंने कहा क्यों न करूँ।

और देखतें हैं क्या किया... हाँ तो मैं फ़रवरी से गर्मी की छुट्टियों के लिए नौकरी ढूँढ रहा था। एक दो interview हुए, ठीक ठाक गए पर किसी को मैं कुछ खास भाया नहीं तो अप्रैल तक मेरे पास कोई प्लान नहीं था। अब मेरे roommates दोनों सालों को तब तक कुछ बढ़िया करने को मिल गया था। एक किसी बड़ी company में काम करने जा रहा था और दूसरा research कर रहा था। मैंने सोचा यार मेरी तो वाट लगने वाली है। अप्रैल आ गया है और मेरे पास कुछ नहीं है। फिर तो मैंने दबा कर नौकरियों की तलाश शुरू करी और हर हफ़ते एक या दो interview किये। तक्रीबन अप्रैल के बीच में Microsoft से एक ईमेल आई और उन्होंने मुझसे कहा कि वे चाहतें है कि मैं Seattle जाऊँ उनसे interview करने के लिए। मैंने कहा ठीक है देखतें हैं काम तो खैर यह लोग मुझे शायद ही देंगे पर कमसकम एक नया शहर तो देखने को मिल जाएगा। फिर मैं अप्रैल के अंत मैं आखिरकार वहाँ गया। यार यह लोग भी बड़े सही हैं। क्या होटल दिया मुझे ठहरने के लिए और हर चीज़ के लिए वे खर्चा उठा रहे थे। अगर मुझे उस होटल में अपनी जेब से पैसे देने होते तो एक रात के साड़्हे पाँचसौ डौलर थे। खैर interview भी दबा कर लेते हैं। सुबह (प्रात:काल =]) नौ बजे मुझे वहाँ बुलाया, दस बजे से interview प्रारंभ हुए और श्याम के चार बजे समाप्त हुए। कुम मिलाकर ("कुल मिलाकर" लिखने से मुझे अपने नवी क्लास के physics टीचर की याद आती है - रंजीत रौए) मैं चार लोगों से मिला और उनमें से तीन ने programming के प्रश्न पूछे। ज़्यादातर के उत्तर मैं दे सका पर एक सवाल था जिसको मैं सिर्फ O(nlogn) में solve कर पाया पर जिसका O(n) solution था जो मैं ढूँढ नहीं पाया। ख़ैर, मेरी वापसी रात के नौ बजे थी तो मैं थोड़ा Seattle शहर भी घूम लिया। बहुत ज़्यादा सुंदर शहर है। वहाँ taxi चालक हिंन्दुस्तानी बहुत हैं। Airport से होटल जाने के वक़्त मुझे एक काफ़ी चिपकू type का सरदार मिला पर दूसरी बार काफ़ी ठीक ठाक सा बन्दा मिला। Microsoft के लोगों ने कहा था कि मुझे दो दिन में उत्तर देंगे। दो दिन बीत गए, एक हफ़ता बीत गया बर कोई जवाब न आया। फिर पिछले सोमवार को मैं क्लास से बाहर आ रहा था कि मेरा फ़ोन बजा और मुझे यह ज्ञान प्राप्त हुआ कि जिस टीम के साथ मैं मिला था वे मुझे नहीं चाहते पर कि वे मेरे लिए "opportunities" खोजते रहेंगे और कुछ मिलेगा तो मुझे बता देंगे। अब ज़्यादातर लोगों को पता है कि यह इनका न कहने का सुशिष्ट तरीका होता है। बस फिर मैंने सोचा कि कमसकम मैंने एक शहर तो मुफ़्त में देख लिया। पर मुझे उनसे फिरसे फ़ोन आया बुद्धवार को कि उनके पास मेरे लिए एक position है। और क्या deal है यार। यह लोग अपने interns के साथ क्या बढ़िया बर्ताव करते हैं। रहने के लिए जगह देंगे, आने जाने के लिए वाहन का इंतेज़ाम करेंगे, फ़िटनेस क्लब में membership देंगे और ऊपर से वेतन भी देंगे। मस्त है यार। बस यह लोग मुझसे पूरे बारह सप्ताह काम कराएंगे तो मैं गर्मियों में घर नहीं जा पाऊँगा। कुछ पाने के लिए कुछ तो खोना ही पड़ता है।

चलो भई, बाकी बात बाद में। सुबह के सवा पाँच बज गए हैं और मुझे बहुत नींद आ रही है। मेरे यहाँ के दोस्त मुझे कोसेंगे के मैंने इतने दिनों के बाद कुछ लिखा तो वह भी हिन्दी में।

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बहुत दिनों से मुझे इस दिन का इन्तेज़ार था। मोज़िला ने २० दिसम्बर को हिन्दी रेंडरिंग वाला बग फ़ायरफ़ौक्स से आखिरकार निकाल ही दिया। मोगैम्बो खुश हुआ! परंतु इसे इस्तेमाल करने के लिए आपको माईनफ़ील्ड (फ़ायरफ़ौक्स के तीसरे करण का ऐलफ़ा) अपने कम्प्यूटर पर डालना पड़ेगा। बस अब फ़ायरफ़ौक्स ३ का बेसबरी से इन्तेज़ार रहेगा।

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सबसे पहले: नंदिनी मैम को उनके जन्मदिन की बहुत बहुत शुभकामनाएँ! आशा है कि उनका अबू ज़बी में मन लग रहा होगा।

ये अमरीकी और कुछ ना करें पर आपके लिए दरवाज़ा ज़रूर खोल के रखेंगे। कभी कभार तो ऐसा होता है कि बन्दा आपसे अच्छे खासे बीस कदम आगे चल रहा है और दरवाज़े तक पहुँचने के बाद उसे खोले आपकी प्रतीक्षा कर रहा है। यह भी नहीं कि आप उससे थोड़े ही पीछे आ रहे हैं और वह सही ढंग से आपके लिए दरवाज़ा पकड़े खड़ा हुआ है। यहां तो ऐसी बात है कि अगर बन्दे ने आपको एक बार बस देख लिया - चाहे आप एक मील दूर भी क्यों ना हो - तो वह गधे की तरह आपका इंतेज़ार करता रहेगा। अंत में आप ही बेचारे पर तरस खा कर अपनी चाल की गति बढ़ाएंगे। अच्छे खासे आचरण को दुराचरण में बदलना तो कोई इनसे सीखे।

In other news, this week has been incredible. Incredibly evil is what I mean. On Sunday night, I had a paper due. Monday was still OK, but on Tuesday, I had to pull a "9 to 9er". 12 hours of continuous work on Computer Science is not as much fun as I thought it would be. OK, so I didn't think it would be really all that much fun, but it seems really incredible that you did it once you do it. That's what happens when you have two problem sets due on the same day. On Wednesday night, it was the Maths problem set that was due the next morning, and this Multivariable Integration, along with Vector Fields and Line Integrals is really getting out of hand. I understand almost none of it, and it was equivalent to being asked to compose an elaborate article in Greek within 5 hours and being handed a "Greek for Dummies" book. Translation: bad times. Of course, the Maths problem set wasn't the only thing to worry about, because I had a Computer Science exam the next day as well, and if it weren't in the evening, I would have been dead. And not dead like "dead", but dead like Mozart. Fellow composed all his life, now he's sitting and decomposing.

Meanwhile, in a flawed "hoo haa" moment, I realized that Mozilla for Mac (including Firefox and even <gasp> Camino) does not have support for Devanagri text and it just shows up as ?????. That was a blow, I must say. I have to unfortunately go back to Safari just because I use Hindi so much. Bad times.

But, let the cheer not be drowned, for 'tis a three-day weekend now (thanks to Monday being "President's Day") and it's going to be good times once again. I love how a lot of the American holidays work. Instead of setting them as particular dates, they're like "Second Friday of May", so that you always get a three-day weekend and the ruinous and sad possibility of the holiday falling on a Sunday is eliminated. Of course, major stuff like Independence Day and Halloween are date-based.

I think I'll go and get myself a nice, warm burrito right about अभी.

Cheerio.

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